समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

10/16/2017

जोगी जिंदगी में महल लगें कैदखाने-दीपकबापूवाणी (Jogi Zindagi mein mahal lage QaidKhane-DeepakbapuWani)

. तख्त चाहा था अब खोने से डरे हैं, खजाने के प्रहरी अपनी चिंता से भरे हैं।
‘दीपकबापू’ सामान्य से विशिष्ट बन गये, दाग छिप जाते क्योंकि भीड़ से परे हैं।।
---
जोगी जिंदगी में महल लगें कैदखाने, असिद्ध जाते अंदर सिद्धि का सौदा लगाने।
‘दीपकबापू’ मायाजाल में फंसाया उन्मुक्त भाव, चले बाज़ार त्यागी छवि चमकाने।।
---
स्वर्ग की सोचकर जीवन नर्क बनाते, धर्म  के बदले धन देने का तर्क बनाते।
‘दीपकबापू’ अपने सत्य से बौरा जाते, लोग अपने घर का बेड़ा गर्क बनाते।।
--

अपने ठंडे दिमाग से दूसरों में जोश जगाते, जज़्बात लूट लें इसलिये होश भगाते।
‘दीपकबापू’  धोखे और गद्दारी के महारथी, कुकृत्यों पर मुहर सफेदपोश लगाते।।
---
सड़क पर महंगाई का रोना सभी रोते, महल में बसते ही सस्ते आंकड़ों पर सोते।
‘दीपकबापू’ थलचरों पर ही करते भरोसा, नभचर बिचारे सदा गिरने का डर ढोते।।
----
भोली बात से ज़माने को ठगते हैं, अपनी लालच से लड़ते हमेशा जगते हैं।
‘दीपकबापू’ पैसे पद प्रतिष्ठा के भूखे हैं, मगर परोपकारी छवि ओढ़े लगते हैं।।
---

9/24/2017

देशभक्ति का भूत महंगाई से उतर जाता है-दीपकबापूवाणी (Deshbhakati Ka Bhoot mahnagai se utar jata hai-DeepakBapuWani)

 पर्दे के पीछे फर्जी मुद्दे तय करते हैं, चौराहे पर चर्चा में बेकार तर्क भरते हैं।
‘दीपकबापू’ बेअक्ल बुतों का गुण गाते, बिके अक्लमंद सच कहने से डरते हैं।।
---
देशभक्ति का भूत महंगाई से उतर जाता है, सारे भाव महंगा तेज हज़म कर जाता है।
‘दीपकबापू’ राष्ट्रवाद के नशे में डूबे रहते, धीरे धीरे जेब का ख्याल भी भर जाता है।।
---
फायदे के लिये प्रेम तो कभी घृणा व्यापार करें, मतलब के खंजर की तेज धार करें।
‘दीपकबापू’ श्रृंगार कर सजते पर्दे पर चेहरे, पीछे जाकर पैसे का मोटा लिफाफा पर करें।।
---
न सुनने वाले सभी कान बहरे नहीं होते, सोचने वाले सभी दिमाग गहरे नहीं होते।
‘दीपकबापू’ झूठ बेचकर महल बना लिये, ईमानदारों के निवास पर पहरे नहीं होते।।
---

राजपद का नशा सभी पर चढ़ जाता है, भलाचंगा भी घमंड की तरफ बढ़ जाता है।
‘दीपकबापू’ राजमार्ग पर चलते संभलकर, राजवाहन का शिकार तस्वीर में मढ़ जाता है।।
--

9/06/2017

देह की उष्मा भी मन को जलाती है-दीपकबापूवाणी (Deh ki ushma bhi man ko jalati hai-DeepakBapuWani)

वह दिलासा क्यों देंगे जिनके दिल टूटे हैं, क्यों बांटेंगे जो उन्होंने सिक्के लूटे हैं।
‘दीपकबापू’ कान बंद किये आंखें बुझाये बैठे, ईमान के नाम लेकर बेईमान छूटे हैं।।
--
अपने काम का फल सभी स्वयं चखते हैं, परायी वफा का हिसाब नहीं रखते हैं।
‘दीपकबापू’ डाल देते अपनी चाहत बट्टे खाते, अल्लहड़ बेहिसाब खुशी रखते हैं।।
-------
मुंह में राम तो मन में माया बसी है, खाने के खेल में इंसान की काया फंसी है।
‘दीपकबापू’ अक्ल से बात करें तो कैसे, वहमों चिंताओं ने उसकी नकेल कसी है।।
--
एकरस में ऊबा मन भ्रमण करना चाहे, हास्य में मर्यादा का अतिक्रमण करना चाहे।
‘दीपकबापू’ एक शहर से दूसरे में चले जाते, चाहत सदा दिमाग में संक्रमण भरना चाहे।।
---
देह की उष्मा भी मन को जलाती है, कुपित शीत भी पूरे तन को गलाती है।
‘दीपकबापू’ वर्षा की बूंदों से होते पुलकित, बाढ़ बनकर वह भी दर्द लाती हैं।।
---
ज़माने के द्वंद्वों में मनोरंजन के झूले हैं, पराये पर हंसे अपने दर्द भूले हैं।
‘दीपकबापू’ ढूंढते कातिलों में फरिश्ते, भूखा प्यासा इंसान देखकर फूले हैं।।
--
अपना आसरा पराये कंधों पर रखते हैं, टूटा स्वयं से यकीन बाहर तकते हैं।
‘दीपकबापू‘ आत्मचिंत्तन से घबड़ाकर भागते, कामयाबी के सपने ही पकते हैं।।
’’’

लोकप्रिय पत्रिकायें

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर