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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

4/01/2018

अनुभवी मरीज मर्ज की दवा का प्रचार करते-दीपकबापूवाणी (expirenced pection add for medicine-DeepakBapuwni)

रसायन से चमके उनके चेहरे यूं ही चांद हो जाते, पर्दे पर शेर बनते फिर मांद में खो जाते।
‘दीपकबापू’ सफेद शब्द की लगी नामपट्टिका, नीयत के काले अपना घर भी फांद जो जाते।।
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जनधन पर पहरेदार ही गिद्धो जैसे झपटते, गरीबों घर जाते रोटी के हिस्से ढेर कटते।
‘दीपकबापू’ बरसों से करें जनकल्याण का व्यापार, मित्र भी बिना दिये बिना नहीं पटते।।
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बड़े लोग जो गिरगिट जैसे रंग बदलते, आम आदमी कछूऐ जैसे अपनी छाया में पलते।
‘दीपकबापू’ चेहरे पर होते कभी न फिदा, देखें कौन अपने स्वार्थ से चरित्र चाल चलते।।
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अनुभवी मरीज मर्ज की दवा का प्रचार करते, सब जगह हकीम होने का दंभ भरते।
‘दीपकबापू’ रुग्ण समाज ले रहा कृत्रिम सांस, हवा के झौंके से सबके कदम डरते।।
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राजपद पाने वह दर्द बहुत उठाते, फिर मुफ्त की हमदर्दी जनमानस में लुटाते।
‘दीपकबापू’ प्रसिद्धि से पंचर हुआ दिमाग, काम न करने के ढेर बहाने जुटाते।।
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नदिया की धारा देखने के काम में लगे, वेतन से खुश नहीं बेबस नाविकों को ठगे।
‘दीपकबापू’ ऊपर से नीचे सीढ़े से आये, मिले नहीं भ्रष्टाचारी कभी किसी के सगे।।
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खानपान रहनसहन ऊंचा हुआ उन्हें बड़ा जान, गुलामी के नुस्खे समझें बड़ा ज्ञान।
‘दीपकबापू’ खोपड़ी कर ली सोच से खाली, निरर्थक बात से बढ़ा रहे अपनी शान।।
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2/04/2018

धरती सूखी कागज पर बढ़िया राज चले-दीपकबापूवाणी (Dharti sookhi kagaz par badhiya raj chale-DeepakbapuWani

लोकतंत्र में जरूर गण का तंत्र ही दिखता, पर्दे के पीछे पटकथा धनतंत्र ही लिखता।
‘दीपकबापू’ सामने हंसी का खजाना बांटे, दर्द के इलाज में विज्ञापन मंत्र ही बिकता।।
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संदेश शांति का इरादा कमाना होता, भलाई के नाम अपना हित जमाना होता। 
‘दीपकबापू’ भावनाओं के बाज़ार में खड़े, वही सफल जो नैतिकता न जाना होता।।
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हाड़मांस का इंसानी बुत महल में पड़ा है, सांस चलती पर दिमाग में पत्थर जड़ा है।
‘दीपकबापू’ नारे लगवाकर तख्त पर बिठाते, पाप पुण्य से अनजान चिकना घडा है।।
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ईमानदारी भी सिक्कों में ही तोली जाती, बाज़ार में हर शय की कीमत बोली जाती।
‘दीपकबापू’ बड़े होकर भी दौलत के गुलाम, कमाई से उनकी काबलियत तोली जाती।।
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धरती सूखी कागज पर बढ़िया राज चले, बस्ती के अंधेरे से महल में रौशनी जले।
‘दीपकबापू’ अपनी रक्षा देव के हाथ में माने, भ्रष्ट पहरेदार चोरों की जेब से पले।।
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पर्दे के उस पार शत्रु का साया बतायें, रक्षा के ठेकेदार हर पल भय आया जतायें।
‘दीपकबापू’ लगे आम दिनचर्या में निश्चिंत, राजकाल की चर्चा फुर्सत की माया जतायें।।
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11/02/2017

वह इलाज की दुकान खोले हैं-दीपकबापूवाणी (Vah ilaz ki dukan khole hain-Deepakbapuwani)

हमदर्दी अब मुखविलास जैसी
रुखेपन की शिकायत मत करिये।
‘दीपकबापू’ हर हाल पर रहना सीखो
दिल में सोच ज्यादा न भरिये।।
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अहो! कल तुम याद आ रहे हो
क्योंकि आज तुम जैसा नहीं है
अहो! कल तुम जब आओ
तो लगे आज जैसा नहीं है।
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लोग मजा तभी तो लूटें
जब जज़्बात जिंदा रखें हों।
प्यार का स्वाद तभी तो समझें
जब दिल का रस चखें हों।
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वह इलाज की दुकान खोले हैं,
बीमारी फैलते देख उनके मन डोले हैं।
‘दीपकबापू’ टूटे मन की दवा नहीं
शरीर चाहे ठंडा अंदर जलते शोले है।
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उजड़े शहर जीत जश्न मना रहे हैं,
टूटी इमारतों की तस्वीर बना रहे हैं।
‘दीपकबापू’ अपना भलमानस चेहरा
हथियारों के सौदागर बना रहे हैं।
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