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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

7/24/2017

उन्हें क्या आजमायें वफा निभाना जिनको पसंद नहीं है-हिन्दी क्षणिकाऐं (3 Short Hindi poem)

सोने की तलवार
चांदी की म्यान 
कौन अमीर जंग करेगा।
कागज पर खींची
आड़ी तिरछी रेखायें
जज़्बतों की सुखी स्याही
कौन रंग भरेगा।
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उन्हें क्या आजमायें
वफा निभाना
जिनको पसंद नहीं है।
क्या बोलें 
उनकी बेलगाम जुबान बंद नहीं है।
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भेड़ियों को यार बनाया
कब तक वह जान बचायेंगे।
कत्ल के कारोबार में
मासूम चीखों से 
कब तक कान बचायेंगे।
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4/03/2017

सेवक सिंहासन पर विराज स्वामी हो जाते-दीपकबापूवाणी (singhasan par Sewak Swami Ho jate-DeepakBapuWani

अपनी राह चलें यह मति नहीं है, बोलते बहुत पर सोच की तेज गति नहीं है।
दीपकबापू’  बुद्धि खर्च करते निंदा पर, संपदा के सभी पर प्रशंसा पति नहीं है।।
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चंद पल में इंसान अपने भाव बदलते हैं, डरकर विश्वास की नाव बदलते हैं।
दीपकबापूजिंदगी के खिलाड़ी बहुत हैं, सभी पैंच से पैदल दाव बदलते हैं।।
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नाकाम इंसान बहानों का रस पिलाता है, जाति धर्म के सहारे हाथ पांव हिलाता है।
दीपकबापूअपने मतलब में सदा फंसा, ज़माने के दर्द में झूठी हमदर्दी मिलाता है।।
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चाहत के समंदर में बहुत गोते लगाये, जिन्हें हाथ से दिये मोती सभी रोते पाये।
दीपकबापूगौर से देखते खाली हाथ, परायी कामना का खेत मुफ्त जोते आये।
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इंसान की पहचान उसके इरादे हैं, कोई चालाक खिलाड़ी कोई सीदे प्यादे हैं।
दीपकबापूसौदागर करते चतुराई, बेबस मन सूंघता चारे जैसे झूठे वादे हैं।।
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सेवक सिंहासन पर विराज स्वामी हो जाते, कर्तव्य भूल अधिकार में खो जाते।
दीपकबापूजनकल्याण के व्यापार में लगे, बड़ी कीमत पर बड़े सौदे हो जाते।।
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स्वयं करें नहीं दूजे से चाहें अपनी आस, स्वयं खाली दूसरें में ढूंढते देव का वास।
दीपंकबापूप्रचार से खड़े हैं बड़े बरगदकभी फल देते ही छाया जैसे घास।।
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हृदय में भाव नहीं सामने चित्र धरे हैं, मतलबपरस्ती में ही फंसे मित्र परे हैं।
दीपकबापूगंदगी में ढूंढते रहें सुगंध, बंद नासिका मुंह से जो इत्र चरे हैं।।
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अल्पधन होने का दर्द भी कम होता, भीख की तरह मदद देने का गम होता।
दीपकबापूमरे दिल के अमीर बने हैं, राजस्व लूट में भी चक्षु नहीं नम होता।।
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राजकाज की समझ कभी पायें, गद्दी चढ़ने के लिये दिखाते कलायें।
दीपकबापू’  जब से लोग आम हुए हैं, वादे घोलकर चालाक रस बनायें।।
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कौये लूट लेते मोती भले खायें नहीं, सोचते बेबस हंस चले जायें कहीं।
दीपकबापूगिरगिट मित्र बनाने लगे, डरते वफा का रंग भले पायें नहीं।।
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3/08/2017

जिंदगी के मजे हर कोई लेता राजा हो या बंजारा-हिन्दी कवितायें (Zindag ke maze har koyee leta-HindiPoem)


जिंदगी के मजे
हर कोई लेता
राजा हो या बंजारा।
कहें दीपकबापू
रंगे पत्थर से अच्छा लगे
खेत का नज़ारा।।
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हिन्दी क्षणिका
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असली नायकों का त्याग
अभिनय के बाज़ार में
बिकता है।
नाटकीयता के भाव से
दिल का जज़्बात
सौदे में टिकता है।
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कोई इतना बता देता
दिल से दिल कहां मिलते हैं
हम भी चले जाते।
सभी को प्रेम से
अपने गले लगाते।

रोने वाले किराये पर भी
जब मिल जाते हैं।
दर्द के सौदागरों के 
चेहरे खिल जाते हैं।
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अक्लमंद कहलाये
जब सुविधाओं ने
दबंग बनाया।
छिन गयी अब
डर के स्वांग से
स्वयं को अपंग बनाया।


अभिव्यक्ति पर बंधन का
वह शोर मचाते हैं।
कहें दीपक बापू 
डंडे झंडे हाथ में
खुद ही पांव से बांधकर रस्सी
आजादी का जोर लगाते हैं।
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महल की रोशनी
बस्ती के अंधेरे पर
सवाल करना मना है।
बेबस पर दबंग का
मुक्का तना है।
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हाथ उसने
मांगने के लिये नहीं दिये हैं।
चलता रह जिंदगी में
पांव उसने घर में
टांगने के लिये नहीं दिये हैं।
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मन में लालचों की
लड़ती हुई फौज है।
कहें दीपकबापू खाली हाथों में
खेलती मौज है।
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मन ने पंख लगा लिये
आजादी से उड़ जाता है।
कहें दीपकबापू रीतियों के बोझ में
कौन खुशी से जुड़ पाता है।
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वह लोग हमें भूल गये
फिर भी हमारी याद में बसे हैं।
दीपकबापू न जाने सोच के दायरे
बहुत बड़े कहें या कसे हैं।

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