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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

8/16/2017

राजकाज में लघुजन भी हो गये बड़े-दीपकबापूवाणी (Rajkajmein laghujab bhi ho gaye badd-DeepakBapuWani)

राजकाज में लघुजन भी हो गये बड़े, सिर चांद चढ़े पांव उनके आकाश में खड़े।
‘दीपकबापू’ दिन भर जंग रात को सो जाते, औकात में रहे आमजन वही बड़े।।
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इष्ट को भक्त भ्रष्टों को भ्रष्ट प्यारे हैं, दुआ से फले पर बद्दुआ के भी मारे हैं।
‘दीपकबापू’ भलाई के धंधेबाज सेवक बने, बड़े पदनाम से कमाई में वारे न्यारे हैं।।
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परिवार पालने के लिये तख्त पर चढ़े हैं, प्रजा कहां देखें रिश्ते ही उनके बड़े हैं।
‘दीपकबापू’ पर्दे पर ही दिखते नये महापुरुष, रास्ते पर तो आमइंसान ही खड़े हैं।।
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इंसान की पहचान चेहरे पर नहीं लिखी, बिकती बाज़ार में चाहे कीमत नहीं दिखी।
‘दीपकबापू’ अपनी लालची नीयत छिपा देते, ज़माना भी क्या करे जो असलियत दिखी।।
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करते आत्मविज्ञापन अपनी नहीं पहचान, बजवाते किराये पर ताली नहीं जिनकी शान।
‘दीपकबापू’ दहाड़ते  ध्वनि विस्तारक यंत्र के सहारे, रुग्ण कंठ आवाज में नहीं बची जान।।
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जनता के सेवक अब स्वामी बन गये हैं, लोकतंत्र में तानाशाही के हामी बन गये हैं।
‘दीपकबापू’ पद पर विराजे ताना सहते नहीं, दबंग लुटेरों के अनुगामी बन गये हैं।।
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युद्ध के शंखनाद प्रतिदिन होते रहेंगे, आम लोग अपने दाव खोते रहेंगे।
‘दीपकबापू’ सौदागरों के खेल देखते, उनकी बेची हंसी रोना ढोते रहेंगे।।
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स्वयं आजाद कहना हरेक को अच्छा  लगता है, लालची बंधन में आप ही ठगता है।
‘दीपकबापू’ चाल चलन का हिसाब देखते नहीं, दुष्चरित्र भी छबि बनाने में जगता है।।
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अपनी कामयाबी का स्वयं ढोल बजाते हैं, नाकामी पर पराया दोष सजाते हैं।
‘दीपकबापू’ समाजसेवक वेश में सौदागर, उनकी अदा से परोपकारी लजाते हैं।।
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7/24/2017

उन्हें क्या आजमायें वफा निभाना जिनको पसंद नहीं है-हिन्दी क्षणिकाऐं (3 Short Hindi poem)

सोने की तलवार
चांदी की म्यान 
कौन अमीर जंग करेगा।
कागज पर खींची
आड़ी तिरछी रेखायें
जज़्बतों की सुखी स्याही
कौन रंग भरेगा।
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उन्हें क्या आजमायें
वफा निभाना
जिनको पसंद नहीं है।
क्या बोलें 
उनकी बेलगाम जुबान बंद नहीं है।
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भेड़ियों को यार बनाया
कब तक वह जान बचायेंगे।
कत्ल के कारोबार में
मासूम चीखों से 
कब तक कान बचायेंगे।
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4/03/2017

सेवक सिंहासन पर विराज स्वामी हो जाते-दीपकबापूवाणी (singhasan par Sewak Swami Ho jate-DeepakBapuWani

अपनी राह चलें यह मति नहीं है, बोलते बहुत पर सोच की तेज गति नहीं है।
दीपकबापू’  बुद्धि खर्च करते निंदा पर, संपदा के सभी पर प्रशंसा पति नहीं है।।
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चंद पल में इंसान अपने भाव बदलते हैं, डरकर विश्वास की नाव बदलते हैं।
दीपकबापूजिंदगी के खिलाड़ी बहुत हैं, सभी पैंच से पैदल दाव बदलते हैं।।
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नाकाम इंसान बहानों का रस पिलाता है, जाति धर्म के सहारे हाथ पांव हिलाता है।
दीपकबापूअपने मतलब में सदा फंसा, ज़माने के दर्द में झूठी हमदर्दी मिलाता है।।
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चाहत के समंदर में बहुत गोते लगाये, जिन्हें हाथ से दिये मोती सभी रोते पाये।
दीपकबापूगौर से देखते खाली हाथ, परायी कामना का खेत मुफ्त जोते आये।
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इंसान की पहचान उसके इरादे हैं, कोई चालाक खिलाड़ी कोई सीदे प्यादे हैं।
दीपकबापूसौदागर करते चतुराई, बेबस मन सूंघता चारे जैसे झूठे वादे हैं।।
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सेवक सिंहासन पर विराज स्वामी हो जाते, कर्तव्य भूल अधिकार में खो जाते।
दीपकबापूजनकल्याण के व्यापार में लगे, बड़ी कीमत पर बड़े सौदे हो जाते।।
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स्वयं करें नहीं दूजे से चाहें अपनी आस, स्वयं खाली दूसरें में ढूंढते देव का वास।
दीपंकबापूप्रचार से खड़े हैं बड़े बरगदकभी फल देते ही छाया जैसे घास।।
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हृदय में भाव नहीं सामने चित्र धरे हैं, मतलबपरस्ती में ही फंसे मित्र परे हैं।
दीपकबापूगंदगी में ढूंढते रहें सुगंध, बंद नासिका मुंह से जो इत्र चरे हैं।।
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अल्पधन होने का दर्द भी कम होता, भीख की तरह मदद देने का गम होता।
दीपकबापूमरे दिल के अमीर बने हैं, राजस्व लूट में भी चक्षु नहीं नम होता।।
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राजकाज की समझ कभी पायें, गद्दी चढ़ने के लिये दिखाते कलायें।
दीपकबापू’  जब से लोग आम हुए हैं, वादे घोलकर चालाक रस बनायें।।
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कौये लूट लेते मोती भले खायें नहीं, सोचते बेबस हंस चले जायें कहीं।
दीपकबापूगिरगिट मित्र बनाने लगे, डरते वफा का रंग भले पायें नहीं।।
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