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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

2/04/2018

धरती सूखी कागज पर बढ़िया राज चले-दीपकबापूवाणी (Dharti sookhi kagaz par badhiya raj chale-DeepakbapuWani

लोकतंत्र में जरूर गण का तंत्र ही दिखता, पर्दे के पीछे पटकथा धनतंत्र ही लिखता।
‘दीपकबापू’ सामने हंसी का खजाना बांटे, दर्द के इलाज में विज्ञापन मंत्र ही बिकता।।
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संदेश शांति का इरादा कमाना होता, भलाई के नाम अपना हित जमाना होता। 
‘दीपकबापू’ भावनाओं के बाज़ार में खड़े, वही सफल जो नैतिकता न जाना होता।।
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हाड़मांस का इंसानी बुत महल में पड़ा है, सांस चलती पर दिमाग में पत्थर जड़ा है।
‘दीपकबापू’ नारे लगवाकर तख्त पर बिठाते, पाप पुण्य से अनजान चिकना घडा है।।
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ईमानदारी भी सिक्कों में ही तोली जाती, बाज़ार में हर शय की कीमत बोली जाती।
‘दीपकबापू’ बड़े होकर भी दौलत के गुलाम, कमाई से उनकी काबलियत तोली जाती।।
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धरती सूखी कागज पर बढ़िया राज चले, बस्ती के अंधेरे से महल में रौशनी जले।
‘दीपकबापू’ अपनी रक्षा देव के हाथ में माने, भ्रष्ट पहरेदार चोरों की जेब से पले।।
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पर्दे के उस पार शत्रु का साया बतायें, रक्षा के ठेकेदार हर पल भय आया जतायें।
‘दीपकबापू’ लगे आम दिनचर्या में निश्चिंत, राजकाल की चर्चा फुर्सत की माया जतायें।।
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11/02/2017

वह इलाज की दुकान खोले हैं-दीपकबापूवाणी (Vah ilaz ki dukan khole hain-Deepakbapuwani)

हमदर्दी अब मुखविलास जैसी
रुखेपन की शिकायत मत करिये।
‘दीपकबापू’ हर हाल पर रहना सीखो
दिल में सोच ज्यादा न भरिये।।
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अहो! कल तुम याद आ रहे हो
क्योंकि आज तुम जैसा नहीं है
अहो! कल तुम जब आओ
तो लगे आज जैसा नहीं है।
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लोग मजा तभी तो लूटें
जब जज़्बात जिंदा रखें हों।
प्यार का स्वाद तभी तो समझें
जब दिल का रस चखें हों।
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वह इलाज की दुकान खोले हैं,
बीमारी फैलते देख उनके मन डोले हैं।
‘दीपकबापू’ टूटे मन की दवा नहीं
शरीर चाहे ठंडा अंदर जलते शोले है।
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उजड़े शहर जीत जश्न मना रहे हैं,
टूटी इमारतों की तस्वीर बना रहे हैं।
‘दीपकबापू’ अपना भलमानस चेहरा
हथियारों के सौदागर बना रहे हैं।
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10/16/2017

जोगी जिंदगी में महल लगें कैदखाने-दीपकबापूवाणी (Jogi Zindagi mein mahal lage QaidKhane-DeepakbapuWani)

. तख्त चाहा था अब खोने से डरे हैं, खजाने के प्रहरी अपनी चिंता से भरे हैं।
‘दीपकबापू’ सामान्य से विशिष्ट बन गये, दाग छिप जाते क्योंकि भीड़ से परे हैं।।
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जोगी जिंदगी में महल लगें कैदखाने, असिद्ध जाते अंदर सिद्धि का सौदा लगाने।
‘दीपकबापू’ मायाजाल में फंसाया उन्मुक्त भाव, चले बाज़ार त्यागी छवि चमकाने।।
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स्वर्ग की सोचकर जीवन नर्क बनाते, धर्म  के बदले धन देने का तर्क बनाते।
‘दीपकबापू’ अपने सत्य से बौरा जाते, लोग अपने घर का बेड़ा गर्क बनाते।।
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अपने ठंडे दिमाग से दूसरों में जोश जगाते, जज़्बात लूट लें इसलिये होश भगाते।
‘दीपकबापू’  धोखे और गद्दारी के महारथी, कुकृत्यों पर मुहर सफेदपोश लगाते।।
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सड़क पर महंगाई का रोना सभी रोते, महल में बसते ही सस्ते आंकड़ों पर सोते।
‘दीपकबापू’ थलचरों पर ही करते भरोसा, नभचर बिचारे सदा गिरने का डर ढोते।।
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भोली बात से ज़माने को ठगते हैं, अपनी लालच से लड़ते हमेशा जगते हैं।
‘दीपकबापू’ पैसे पद प्रतिष्ठा के भूखे हैं, मगर परोपकारी छवि ओढ़े लगते हैं।।
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